Friday, August 15, 2008

मुशर्रफ़ के पाकिस्तान के गली-कूंचे

मैं जैसे ही इस पोस्ट को लिखने बैठी, न्यूज चैनलों ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के आखिरकार इस्तीफा देना तय कर लेने की खबरों के बीच लाहौर में आत्मघाती हमले की ब्रेकिंग न्यूज चलानी शुरु की। बस, यहीं मुझे पिछली पोस्ट में लिखा सुशांत का कमेंट भी याद आ गया। सुशांत, आप बिलकुल सही हैं। मुशर्रफ के बाद के पाकिस्तान को लेकर तमाम आशंकाएं हैं। इस पर बड़ा सवालिया निशान है कि क्या मुशर्रफ के जाने का सही मतलब पाकिस्तान में सही मायने में लोकतंत्र की स्थापना है या अब कट्टरपंथियों और जेहादी ताकतों को अपना काम करने के लिए पाकिस्तान के रुप में सही मैदान मिल गया है। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस बाबत पहले की अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। हम केवल आशा कर सकते हैं कि वहां जो कुछ हो, वो दोनों देशों और यहां के लोगों के भले के लिए हो।

मेरी पिछली पोस्ट में अनुराग ने लिखा था कि मैं ब्लॉग पर पाकिस्तान के बारे में,वहां के लोगों के बारे में और वहां अपने अनुभवों के बारे में और लिखूं। इतनी सारी बातों को एक पोस्ट में लिखना मुमकिन नहीं है लिहाजा मैंने सोचा है कि मैं एक के बाद एक अपने अनुभव लिखती रहूं। हां, ये जरुरी नहीं है कि ये सब एक क्रम में हों क्योंकि जैसे जैसे मैं यादों के सागर में डुबकी लगाऊंगी,बातें याद आएंगी और मैं उन्हें लिख डालूंगी। मुझे उम्मीद है कि आप इस 'बंपी राइड' का भी लुत्फ लेंगे।

पाकिस्तान 2003 की गर्मियों तक मेरे लिए पूरी तरह एक रहस्य था( एक मायने में ये अब भी है)। इराक के युद्ध के मैदान में तब्दील होने के बाद मुझे मौका मिला कि मैं वहां के पड़ोसी मुल्कों में जा पाऊं। दिसंबर 2001 में संसद पर हमले के करीब डेढ़ साल बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी । इससे भी ज्यादा दोनों देशों में रह रहे लोगों को राहत देने की प्रक्रिया,शांति के लिए नए कदम या कूटनीतिक शब्दों में विश्वास बनाने की कवायद( कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स) की हर तरफ से शुरु हो गई थी। दोनों देशों ने दिल्ली और लाहौर के बीच अरसे से बाधित बस सेवा शुरु करने की घोषणा की, और दोनों देशों के पत्रकारों को सदा-ए-सरहद की मुफ्त सवारी करायी गई। इन सदस्यों में मैं भी एक थी। ऐतिहासिक मौके का गवाह बनने की उत्तेजना और रोमांच से लबालब मैंने इस मौके का पूरा लुत्फ लिया। हमें 530 किलोमीटर लंबी इस यात्रा को पूरा करने में करीब आठ गंठे लगे। मुझे याद है कि देर शाम को बस ने वाघा बॉर्डर पार किया तो वहां मौजूद लोग खुशी से झूम उठे थे। जज्बातों से सराबोर दोनों देशों के रिश्तेदारों ने एक दूसरे को गले लगाया तो भावनाओं का समुन्दर बह उठा।

लाहौर में हमें लोकल मीडिया ने वास्तव में घेर लिया। सभी हमसे एक बाइट चाहते थे। इसके बाद हाथों में गुलदस्ते और फूल लिए लोगों ने देर तक वेलकम पार्टी की। स्थानीय लोगों ने इतनी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया कि हम सारी थकान भूल गए। मुस्कुराते दमकते चेहरे,जो बिलकुल हमारे जैसे थे,भाषा और तौर तरीका,जो हमारी तरह ही दिखता था, ने हमें फौरन घर सा माहौल दिला दिया।

उस रात एक दिलचस्प वाक्या भी हुआ। दिन भर की थकान के बाद,जब मैं होटल के कमरे में सुस्ताने की तैयारी कर कर रही थी,मुझे इंटरकॉम पर एक कॉल आया। वो फोन एक स्थानीय आदमी का था,जिसने खुद को बिजनेसमैन बताया। उसने मुझे एक संदेश दिया। संदेश एकता कपूर के लिए। दरअसल, वो चाहता था कि मैं एकता कपूर को यह संदेश दूं कि वो सास-बहू वाले सीरियल बनाना बंद करे क्योंकि इन सीरियलों का भूत पाकिस्तान की महिलाओं के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। उसकी शिकायत थी कि उनकी पत्नी भी काम के बाद का सारा वक्त सीरियल देखने में गुजारती थी,और इस दौरान वो न केवल उन्हें बल्कि पूरे परिवार को नज़रअंदाज कर देती है। उनकी ये भी शिकायत थी कि भारी भरकम और भयंकर सी दिखने वाली महिला खलनायकों का भी पाकिस्तानी महिलाओं पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है,और इन सीरियलों की वजह से घरों में सास-बहू के झगड़े बढ़ रहे हैं। उन्हें मैंने भरोसा दिलाया कि उनका संदेश मैं एकता कपूर को पहुंचा दूंगी। इसके बाद मैंने फोन काट दिया। निश्चित तौर पर,एकता तक ये संदेश कभी नहीं पहुंचा और ये सास बहू वाले सीरियल आज भी बदस्तूर जारी हैं। वैसे,मैंने ये संदेश दे भी दिया होता तो ऐसा नहीं है कि वो ये सीरियल बनाना बंद कर देती।लेकिन, इस छोटे से वाक्ये ने मुझे इसका अहसास करा दिया कि भारतीय मनोरंजन उद्योग की जड़े पाकिस्तानी समाज में भी गहरी रच-बस चुकी थी। इसकी बानगी अगले कुछ दिनों में और दिखनी थी।

लाहौर की मेरी पहली यात्रा महज तीन दिन की थी। वो यात्रा बहुत बहुत बहुत सीमित दायरे में थी क्योंकि हमने केवल पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय के अधिकारियों के साथ ही यात्रा पूरी की। अगर हमें कहीं खुद जाना होता तो भी हमें सूचना मंत्रायल द्वारा तय पत्रकारों के साथ ही जाना पड़ता था ताकि वो इस बात पर नज़र रख सकें कि हम किस तरह की स्टोरी कर रहे हैं। और हमें उन्हें इस बात का भरोसा दिलाना पड़ता था कि हम कोई नगेटिव स्टोरी नहीं कर रहे हैं। मुझे जिन पत्रकार साथी के साथ भेजा गया था,वो तकरीबन चालीस की उम्र के पारिवारिक शख्स थे। उनके तौर तरीके खासे पॉलिश्ड थे। लेकिन,वो कभी कभी मुशर्रफ और उनके राज को लेकर गाली गलौज कर देते थे। साथ ही,उनका ये भी कहना था कि वो भारत के साथ संबंध सामान्य करने को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। मुझे ऐसा लगता था कि वो ये सब इसलिए कह रहे थे ताकि मुझे उत्तेजित कर सकें और कुछ उगलवा सकें (अगर नकारात्मक हो)। दरअसल, उन्हें शायद लगता हो कि मैं रिपोर्टिंग की वजह से पाकिस्तान के प्रति अपनी दुष्भावना छिपा रही हूं। और मुझे लगता है कि दोनों देशों के बीच दुश्मनी और अविश्वास के लंबे इतिहास के बीच हमारा एक दूसरे पर शक करना एक हद तक लाजिमी था, और उसे समझा जा सकता था। लेकिन,लाहौर में जितने पत्रकार मेरे संपर्क में आए,सब ऐसे नहीं दिखे। मुझे लाहौर में कई बेहद शानदार अनुभव भी हुए। जिनका जिक्र बाद में…

9 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

शीतल जी,


सर्वप्रथम तो स्वाधीनता दिवस की आपको हार्दिक शुभकामनायें। साथ ही सामयिक आलेखों के साथ ब्ळोग जगत में आपकी सक्रियता का आभार..


यह हमेशा ही प्रतीत होता है कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के आवाम में आपसी विद्वेश का कारण सियासी ही है। अपनी जडों में दोनों तरफ के आदमी उतने ही "आम" हैं..आपके द्वारा प्रस्तुत एकता कपूर प्रकरण इसी बात की तस्दीक करता है।


अपने अनुभवों से ब्ळोग जगत को आलोकितकरते रहें।


***राजीव रंजन प्रसाद

www.rajeevnhpc.blogspot.com
www.kuhukakona.blogspot.com

vipinkizindagi said...

स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं

अनुराग said...

बेचारे मुशर्रफ़ अचानक पिछले दिनों से उन्हें कश्मीर इतना याद आया कि हम तो घबरा गए कि फूट फूट के न रो पड़े मंच पर ही.......
चलिए दो बातें तो मालूम चली ...."बाईट" वहां भी डिमांड में रहती है ...शुक्र है उन्होंने आपसे .. प्लास्टिक सर्जन का एड्रेस नही पूछा जो आदमी का चेहरा कितनी सफाई से बदल देते है ...ओर लगातार बदल रहे है.....जय हो एकता की.....

दिनेशराय द्विवेदी said...

शीतल जी, बस इसी तरह लिखती रहिए। मुझे लगता है पूरे उपमहाद्वीप की जनता एक जैसी है। इस मामले में भी कि वह हर बार अपने ही राजनेताओँ से ठगाती है।
एक बार बदलाव का दौर जो शुरू होगा तो पूरा उपमहाद्वीप को बदल देगा।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अलग थे हो कहाँ हम लोग .एक सा तो है सब कुछ ...एकता कपूर के सीरयल ने तो हर जगह अपने झंडे गाड दिए हैं .कोई पसंद करे या न करे उनकी बला से पर देखते इधर वाले भी खूब हैं और उधर वाले भी :)स्वाधीनता दिवस की आपको हार्दिक शुभकामनायें।

Udan Tashtari said...

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

अनूप शुक्ल said...

काश एकता कपूर भी आपका ब्लाग पढ़ती होतीं।

मयंक सक्सेना said...

really nice as you are sharing your memories with us !
The articles are really portraiting and take us with you to ur memory lane !
Mayank Saxena
Zee News
www.cavssanchar.blogspot.com
www.taazahavaa.blogspot.com

sushant jha said...

शीतल जी, एक बात और जो गौर करने लायक है वो ये कि दोनों देशों के समाजिक-धार्मिक बातावरण में भले ही फर्क हो-जनता स्थाई तौर पर दुश्मनी नहीं चाहती।क्षणिक उत्तेजना और आवेश के पल तो हमें दुनिया के कई देशों में दिखाई देते हैं लेिकन इसे हर आवश्यक रुप से साम्पर्दायिकता ही नहीं कहा जा सकता। जहां तक सवाल पाकिस्तान के लोगों के मन में हमारे सास-बहु के असर का है-तो ये तो स्वभाविक ही था। एक ही सास की बहुएं तो हैं दोनों मुल्क। दोनों के मन मे एक ही भावना आना कोई ताज्जुब नहीं। पाकिस्तान का ये दुर्भाग्य रहा है कि उसे आजादी के बाद स्थाई लोकतंत्र नहीं मिला। हो सकता है जिन्ना कुछ दिन और जिन्दा रहते तो उस मुल्क की तस्वीर ही कुछ और होती।इसके उलट हिंदुस्तान को, खानदानवाद के साये में ही सही-एक ढ़ंग की स्थिरता मिल गई।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि पाकिस्तान की सेना और वहां के एलीट वर्ग ने लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए और अपनी अहमियत बचाए रखने के लिए-धार्मिक कट्टरता को खूब बढ़ावा दिया और एक गतिशील मध्यमवर्ग की आवाज कभी जगह नही बना पाई।इसके उलट हमें सौभाग्य से गांधी-नेहरु-लोहिया की लोकतांत्रिक परंपरा मिल गई और सामंती-धार्मिक कट्टरताओं को कुचलने की भरपूर कोशिश की गई।लेकिन आज दोनों देशों के बीच पूर्वाग्रह और अलगाव के भाव इतने गहरे भरे हैं कि इसे एक दिन में दूर भी नहीं किया जा सकता। जरुरी है कि पहले हम सास्कृतिक आदान-प्रदान के उपाय तेज करें। इसके लिए हिंदुस्तान में बढ़ रही कट्टरता पर लगाम लगाना होगा और पाकिस्तान में लोकतात्रिक गतिविधियों को जमकर बढ़ावा देना होगा।