Wednesday, November 12, 2008

हाऊ की याद!

नवम्बर आ चुका है और साथ में सर्द सुबह और ठण्डी शाम ले आया है। ऊनी कपड़े अभी तक पूरी तरह बाहर नहीं आए हैं, लेकिन एक पतली शॉल अब ज़रूरी हो गई है। सबेरे बिस्तर की आरामदेह गर्माहट को छोड़कर उठना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। सुबह की चाय की पहली प्याली का असर जल्दी ही ख़त्म हो जाता है और मुझे जल्दी ही एक और प्याली चाय लेनी पड़ती है! मैं अपनी शॉल की गर्माहट में दुबकी हुई बैठती हूँ, उंगलियाँ कम को मज़बूती से पकड़े होती हैं और जब मैं अपनी बालकनी से बाहर झांकती हूँ, तो मन दशकों पहले की उन सर्द सुबहों में चला जाता है जब मैं जम्मू में स्कूल की छात्रा थी।

अचानक मेरी यादों के फ़्लैशबैक में हाऊ ज़िन्दा हो उठती है। हाऊ पतली-दुबली, छोटी-सी, क़रीब पचास साल की महिला थी। वह हमारे घर में साफ़-सफ़ाई वगैरह का काम किया करती थी। बरसों की कड़ी मेहनत ने उसके चेहरे को झुर्रियों से भर दिया था, हालाँकि उसके बाल तब भी बिल्कुल काले थे, एक भी सफ़ेद तिनके की झलक उनमें नहीं थी। मूलतः वह जम्मू से मीलों दूर बिलासपुर की रहने वाली थी। सालों पहले उसके पति ने उसे और उसके तीन बच्चों को किसी दूसरी औरत के लिए छोड़ दिया था। बिखर चुकी और लोगों के सवालों का सामना करने के लिए अकेली पड़ चुकी हाऊ ने शर्म और ग़रीबी से तंग आकर एक दिन अपने गांव को छोड़ दिया और बेहतरी की तलाश में जम्मू आ गयी, जहाँ उसके गांव के कई लोग छोटे-मोटे काम किया करते थे।

हमारा घर उन कई घरों में से एक था, जहाँ हाऊ काम किया करती थी। काम ख़त्म करके सुबह की चाय हमारे साथ लेना तक़रीबन रोज़ाना का काम था। और बहुत-सी ठण्डी सुबहों को वह अपने देस (गांव) के क़िस्से बड़ी अजीब-सी बोली में हमें सुनाया करती थी, जो मुझे ज़्यादा-कुछ समझ में नहीं आते थे। न ही वह मेरी भाषा ज़्यादा समझ पाती थी, लेकिन फिर भी अजीब बात यह है कि सब कुछ आसानी से कम्यूनिकेट हो जाता था। वह हर बात जो मैं कहती थी, उसपर वह अपना सर हिलाती थी और मुस्कुराते हुए कहती “हाऊ” (हाँ!)। इसलिए हम उसे हाऊ कहकर पुकारते थे! उसका असली नाम फूलबाई था।

हाऊ मुझे अपने गांव से बहने वाली नदी “महानन्दी” (महानदी) की कहानियाँ सुनाया करती थी और बरसात के दिनों की ख़तरनाक नदी के डरावने क़िस्से उनमें शामिल होते थे। उसने मुझे अपने पति और उसके परिवार की कहानियाँ भी सुनाईं। उसके ग़रीब माँ-बाप ने उसकी शादी तब ही कर दी, जब वह एक छोटी-सी बच्ची थी। जैसे ही वह अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी के सुखद शुरुआती दिनों की यादों में डूबती थी, उसकी आँखें चमक उठती थीं और उसकी मुस्कान सौ मील चौड़ी हो जाती थी। हाऊ का पति उससे उम्र में काफ़ी बड़ा था फिर भी उसने अपने पति की पूरे जी-जान से सेवा की, जबतक कि उसने हाऊ को उमर में और भी छोटी लड़की के लिए छोड़ नहीं दिया। उसकी आँखों की चमक को अब दुःख की छाया ढक लेती थी और वह अपने पति को कोसने लगती थी, वह अपने आँसुओं को भी शायद ही रोक पाती थी।

हाऊ हमेशा एक पतली-सी साड़ी पहनती थी जो वह कमर से कुछ इंच ऊपर बांधती थी और वह साड़ी सर्द-से-सर्द मौसम में भी शॉल की तरह उसके कंधों से लिपटी रहती थी। वह मोज़े नहीं पहनती थी, या कहें तो नए मोज़ों का ख़र्चा नहीं उठा सकती थी। मैंने के बार अपनी के पुरानी जोड़ी उसे दी भी, लेकिन उसने उसे कभी पहना नहीं। हमेशा के लिए दुःख सहने वाली त्यागी हिन्दुस्तानी औरत की तरह उसने उसे अपने सबसे छोटे लड़के को दे दिया। वह चाहती थी कि जब वो बड़ा हो तो पढ़-लिख कर बाबू बने। उसने उसे उन परेशानियों और मेहनत से दूर रखा, जिसका सामना उसे और उसके दो बड़े बेटों को हर पल करना पड़ता था। उसे अपने छोटे बेटे से बहुत आशाएँ थीं, लेकिन तब उसका दिल बुरी तरह टूट गया जब उसे पता लगा कि उसका “बिटवा” बुरी संगत में फँस गया है और बहुत ज़्यादा सिगरेट भी पीने लगा है।

मैंने आख़िरी बार उसे तब देखा था जब मैं घर गयी थी। वह और भी बूढ़ी हो चुकी थी और उसके बालों में कुछ चाँदी की लक़ीरें भी झलकने लगीं थीं, लेकिन उसकी मुस्कुराहट उतनी ही प्यारी और सब कुछ भुला देने वाली थी। “बिटवा” पूरी तरह बड़ा हो चुका था और हाँ, वो बाबू नहीं बन पाया था।

हाल में मैं चुनाव-पूर्व सर्वे के लिए छत्तीसगढ़ गयी थी और हमारा जहाज़ इस नवोदित राज्य के जंगलों और गांवों के ऊपर से गुज़र रहा था तो मैं हाऊ और महानदी की दहशत के बारे में सोच रही थी।

Friday, September 26, 2008

सालगिरह मुबारक हो देव साहब

मैं अपनी पोस्ट की शुरुआत सितारों के सितारे, सदाबहार रुमानी नायक, ज़िन्दादिल और आकर्षक देव आनन्द को सालगिरह की बहुत-बहुत मुबारकबाद देकर करती हूँ। हाँ, आज मेरे पसंदीदा अदाकार की 85वीं सालगिरह है और दुनिया भर में फैले हुए उनके लाखों प्रशंसकों की तरह मैं भी यही कामना करती हूँ कि वे सेहतमन्द रहें, ख़ुश रहें और ज़्यादा-से-ज़्यादा फ़िल्में करते रहें।

देव साहब के लिए मेरा लगाव बचपन से ही रहा है और मेरे परिवार में भी सब उनके चाहने वाले हैं। परिवार की सभी महिलाएँ, जिसमें मेरी माँ और मेरी स्व. नानी शामिल हैं, देव आनन्द की पक्की फ़ैन रहीं हैं। हम सभी इस सदाबहार और चिरयुवा नायक के साथ मुस्कुराए हैं, हँसे हैं, गुनगुनाए हैं, सुबके हैं और रोए भी हैं। हमें उनकी अल्हड़, अनौपचारिक और आधुनिक स्टाइल बेहद भाती थी। वे हमेशा बहुत स्वाभाविक लगे हैं, चाहे वे जिस किसी किरदार में भी क्यों न हों। 60 के दशक की क्लासिक फ़िल्म “हम दोनों” में उनका सेना के अफ़सर का किरदार, उनके घरेलू प्रोडक्शन “तेरे घर के सामने” में दिल्ली के आकर्षक आर्किटेक्ट का किरदार और 70 की ब्लॉकबस्टर “हरे रामा हरे कृष्णा” में उनका हिप्पी ऐक्ट मेरे पसंदीदा हैं। वे हमेशा बेहद ख़ूबसूरत लगे हैं, लेकिन साथ ही बहुत असल और विश्वसनीय भी। मेरे ख़्याल से उनकी अपील की वजह उनका अल्हड़ और आधुनिक स्टाइल है। देव साहब ने कभी भी ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीयता का सहारा नहीं लिया, इस कारण उनका आकर्षण और अपील हर उम्र के लोगों को भाते हैं।

साथ ही उनकी ऊर्जा और ज़िन्दगी के लिए उनका उत्साह, ख़ासतौर पर फ़िल्म-निर्माण की कला के लिए, बेहद संक्रामक और प्रेरक हैं। आज भी वे बिना रुके लगातार फ़िल्म बनाते रहते हैं, पचासी साल की उम्र में भी एक नया प्रोजेक्ट उन्हें उतना ही उत्साहित करता है जितना उन्हें 1940 के दौर में करता था जब वे इस क्षेत्र में बिल्कुल नए थे। देव आनन्द पुरानी उपलब्धियों का सहारा लेना पसंद नहीं करते हैं। वे कभी मुड़कर पीछे नहीं देखते हैं। उनके अपने अल्फ़ाज़ में, “लगातार सीखने और चलते रहने की ज़रूरत, दरअसल ज़िन्दा रहने की ज़रूरत है।”

इसके अलावा वे बेहद रुमानी इंसान भी हैं। इस रुमानी सितारे का एक और उद्धरण, “मुझे लगता है कि ज़िन्दगी रुमानी होनी चाहिए, ज़रूरी नहीं कि ऐसा प्यार या अफ़ेयर के नज़रिए से ही हो लेकिन अगर आप एक ख़ूबसूरत पंक्ति पढ़ या लिख रहे हैं, तो यह रुमानी है, अगर आप एक सुन्दर टाई पहन रहे हैं, यह रुमानी है, आपका बोलना रुमानी है।”

कितने ख़ूबसूरत शब्द हैं। मैंने कई बार इन शब्दों को जिया है और इनसे प्रेरणा ली है। मैं आपको एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाती हूँ। पाँच साल पहले, सन् 2003 में, मैं अपनी साथी एंकर के साथ सुबह का कार्यक्रम कर रही थी। इस कार्यक्रम में एक स्टोरी देव आनन्द के बारे में थी कि उन्हें किसी पुरस्कार से नवाज़ा गया है। इस स्टोरी को देखकर मैं अपनी साथी एंकर से बोली, कितने दुःख की बात है कि बॉलीवुड के महानतम सितारों में से एक और एक लिविंग लीजेंड होने के बावजूद देव साहब को अब तक भारतीय फ़िल्म जगत का सबसे बड़ा सम्मान – दादा साहब फाल्के पुरस्कार – नहीं मिला है। यह कहते वक़्त मेरी आवाज़ में आवेश और ग़ुस्से की गूंज थी कि क्या इस पुरस्कार से जुड़े अधिकारी इस तथ्य के प्रति अन्धे हो गए हैं कि लिविंग लीजेंड देव साहब इस सम्मान के सबसे बड़े हक़दार हैं। बाद में उस रात जब मैं सोने की तैयारी कर रही थी, मेरी एंकर मित्र ने फ़ोन किया और उसके बाद उन्होंने जो कहा उसपर यक़ीन करना ज़रा मुश्किल था।

“शीतल, क्या तुमने टीवी पर ख़बर सुनी?”
“कौन-सी ख़बर?”
“अरे भई, अभी-अभी ख़बर आयी है कि देव आनन्द को इस साल के दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। तुम्हारी शिकायत दूर कर दी गयी है”, उसने मज़ाक किया।

मैं आश्चर्यचकित थी। मैंने टीवी खोला और पाया कि ख़बर वाक़ई सच थी!

आने वाले दिनों में और भी कुछ होने वाला था। वो शहर में पुरस्कार लेने के लिए आए थे, मुझे अपने बचपन और वयस्क जीवन के ‘क्रश’ का इंटरव्यू लेने का मौक़ा मिल गया। मैंने राजधानी के एक चमचमाते होटल में उनका इंटरव्यू किया। शूट करने से पहले में काफ़ी नर्वस थी, लेकिन जैसे ही देव साहब लॉबी में आए उन्होंने मुझे पूरी तरह सहज कर दिया।
“हैलो, शीतल। तुमने जो रंग पहना है, वह बहुत प्यारा और ख़ूबसूरत है,” उन्होंने अपने ख़ास अन्दाज़ में एक बड़ी-सी मुस्कान के साथ दोस्ताना लहज़े में हाथ मिलाते हुए कहा।

शताब्दी के महानतम सितारे की तरफ़ से आए इस शुरुआती वाक्य ने मुझे पूरी तरह सहज कर दिया और मैं खुल गयी। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बहुतेरी बातें कहीं, उनमें जो बात मुझे अच्छी तरह याद है और जिसपर उन्होंने सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया, वह यह थी कि इंसान का एक ख़ास अन्दाज़ होना चाहिए।
“मैं ऐसी चीज़ें पहनना पसन्द करता हूँ जो किसी ने न पहने हों। जो भी मेरे शरीर पर है, यह घड़ी, या फिर यह मफ़लर, या यह ढीली पतलून ही लीजिए जो मेरी व्यक्तिगत पसंद और चुनाव को ज़ाहिर करती है। जिस तरह मैं चलता हूँ, या बोलता हूँ, या प्रतिक्रिया देता हूँ, मेरा व्यक्तिगत और ऑरिजिनल स्टाइल है। मौलिक होना बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी सहजता में रहना ही ऑरिजनल होना है। आप रोल मॉडल बन जाते हैं अगर आपकी स्टाइल में मौलिकता है तो।”

तो यह है उनका मंत्र उनके ही मुंह से।

अब मैं अपनी बात देव आनन्द की फ़िल्म “हम दोनों” के उस मशहूर गाने के साथ ख़त्म करती हूँ, जो उनकी शख़्सियत को बयान करता है और कईयों के लिए प्रेरणास्रोत रहा है –

“मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया,
हर फ़िक़्र को धूएँ में उड़ाता चला गया।”

नोट – साइट के लिंक के लिए सागर जी को और कब्बन मिर्ज़ा की तस्वीरों के लिए युनूस जी को धन्यवाद।

Saturday, September 20, 2008

आओ, एक गीत गुनगुनाएँ

मैं मेकअप-रूम में बैठी हुई थी और अपने कार्यक्रम के लिए तैयार हो रही थी। मेरी आँखें बन्द थीं और मैं हिन्दी फ़िल्म रज़िया सुल्तान के सपनीले गाने की ख़ूबसूरत धुन में डूबने की कोशिश कर रही थी – आई ज़ंजीर की झंकार ख़ुदा ख़ैर करे, दिल हुआ किसका गिरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे। यह गाना हमारे हेयरस्टाइलिस्ट की मेहरबानी से बज रहा था, जिसके सेल फ़ोन पर गानों का बेहतरीन संग्रह है और हमेशा किसी-न-किसी गीत से हमारा मनोरंजन करता रहता है। कब्बन मिर्ज़ा की अप्रतिम आवाज़, जाँनिसार अख़्तर के शानदार अल्फ़ाज़ और ख़ैयाम का बेहतरीन संगीत कमरे में जादू-सा माहौल पैदा कर रहे थे और हम सभी साथ-साथ गुनगुना रहे थे। वह पल सुकून और आनन्द से भरा हुआ था।

हालाँकि वह समाधि-सी अवस्था पिया की आवाज़ से जल्दी ही ख़त्म हो गयी - शीतल, तुम्हारे साथ क्या दिक़्क़त है? तुम क्या कचरा सुन रही हो? और कितनी अजीब आवाज़ है! पता नहीं यह बारहवीं शताब्दी का गाना है या क्या? मैं अचंभे और सदमे में थी। कोई कैसे ख़ैयाम के मशहूर संगीत से अनजान हो सकता है और सबसे अहम बात तो यह कि कोई संगीत के इस मास्टरपीस के प्रति इतना असम्वेदनशील कैसे हो सकता है? लेकिन पिया को वाक़ई इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि जब ख़ैयाम ने अपना यह मशहूर गीत बनाया होगा उस वक़्त मेरी यह ऊर्जस्वी और युवा सहकर्मी पालने में झूल रही होगी। “पिया, यह भारतीय फ़िल्म जगत के एक नामी संगीतकार की बहुत मशहूर रचना है। अपनी माँ से पूछना, मुझे यक़ीन है कि उन्होंने यह गाना ज़रूर सुना होगा”, मैंने उससे समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

क’मॉन, गिव मी अ ब्रेक। मेरी माँ इस तरह का बहनजी स्टफ़ नहीं सुनती है। उसकी पसन्द बहुत ‘हिप’ और नयी है।
हिप, किसमें? रॉक, पॉप, हिप हॉप वगैरह?
बिल्कुल, वो बीटल्स, बोनी-एम और 70’s और 80’s के बैण्ड्स सुनती है।
और मैं भी सुनती हूँ। लेकिन मैं अपने ख़ैयाम, मेहदी हसन और सी. रामचन्द्रन से भी प्यार करती हूँ।
अब ये लोग कौन हैं?

हमारी बातचीत यहाँ ख़त्म हो गयी, क्योंकि मुझे अपने कार्यक्रम के लिए जाना था। लेकिन इस वाक़ये ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। दरअसल यह मेरे लिए काफ़ी दुःखद था कि कोई संगीत में इतना भेद-भाव कर सकता है, एक ऐसी भाषा जो बेहद पवित्र और सार्वभौमिक है। कम-से-कम मैं तो ऐसा सोचते हुए ही बड़ी हुई हूँ। मैं संगीत से प्रेरित, उत्साहित, चकित, आन्दोलित हुई हूँ और संगीत ने मुझे भीतर तक छुआ है। यह कुछ ऐसा है जो मेरे ऊर्जा-स्तर को तुरंत बढ़ा देता है। मेरा संगीत-प्रेम उस दौर का है, जब मैं छोटी-सी बच्ची हुआ करती थी। मेरे माता-पिता बताते हैं कि तब मैं 70 के दशक के मशहूर गाने गुनगुनाने की कोशिश किया करती थी... कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है – अपनी तोतली ज़ुबान में। हम संगीत के उस बेहतरीन संग्रह को सुनते हुए बड़े हुए हैं जो मेरे माता-पिता के पास था; जिसमें जगजीत-चित्रा की ग़ज़ल से लेकर 60 और 70 के बीटल्स और कार्पेण्टर्स जैसे अंग्रेज़ी बैंड और 50 के दशक का गीता दत्त व हेमंत कुमार का मधुर संगीत भी शामिल है।

हमने संगीत की विभिन्न विधाओं में कभी भेदभाव नहीं किया। बीटल्स के सितार और गिटार के फ़्यूज़न ‘नॉरवीजन वुड्स’ ने मुझे उतना ही आन्दोलित किया है जितना कि तलत महमूद के मधुर और धीमे गीत ‘मैं दिल हूँ इक अरमान भरा, तू आके मुझे पहचान ज़रा’ ने। प्रसिद्ध अमरीकी रॉकर नील डाइमंड के ‘कंटकी वूमन’, ‘ब्रुकलिन रोड्स’ और ‘प्ले मी’ ने मेरी आत्मा को उतना ही छुआ है, जितना कि शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन के ‘आए कुछ अब्र कुछ शराब आए’ और ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं’ ने। ज़िन्दादिल मुहम्मद रफ़ी के गीत ‘मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया’ ने मुझे उतना ही प्रेरित किया है, जितना उन्मुक्त फ़्रेंक सिनाट्रा की मेलोडी ‘माई वे’ ने। उस दौर में बीटल्स, ईगल्स, कार्पेण्टर्स, जिम रीव्स, फ़्रेंक सिनाट्रा, एबीबीए और मार्क एंथनी ज़िन्दगी का उतना ही हिस्सा थे जितने लता मंगेशकर, तलत महमूद, मुहम्मद रफ़ी, भूपेन्द्र, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, मेहदी हसन और चित्रा (विख्यात दक्षिण भारतीय गायिका)।

मेरा दिन संगीत से ही शुरू और ख़त्म हुआ करता था। और अभी भी ऐसा ही है। केवल मेरी पसंद की सूची और लम्बी हो गयी है। अब इसमें नटालिया इम्ब्रुगलिया, सेलिना डिओन, जॉन मेयर, जेम्स ब्लण्ट, श्रेया घोषाल, मोहित चौहान, सोना महापात्रा, रबी शेरगिल, शफ़क़त अमानत अली, शांतनु मोहित्रा और शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी भी शामिल हो चुकी है। मुझे कभी-कभी लगता है कि संगीत की तरफ मेरा झुकाव कुछ ज़्यादा ही है। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं है कि मुझे हर दूसरा गाना पसंद ही आए, लेकिन मेरे साथ कुछ ऐसा है कि मैं किसी भी गाने को बिल्कुल खारिज नहीं कर सकती हूँ। संगीत मुझे हर रूप-रंग और विधा में भाता है। और मैं जहाँ भी सफ़र करती हूँ, देश के भीतर या बाहर, मेरी ख़रीदारी के एक बड़े हिस्से में उस इलाक़े का संगीत शामिल होता है! मेरे लिए संगीत जीवन का सार है, प्रेरित करने के साथ ही सुकून देने वाली सबसे बड़ी ताक़त। यह पवित्र है, यह मस्ती-भरा है और साथ ही ध्यान की गहराइयों तक पहुँचाने में भी सक्षम है। और इसलिए मैं कार्पेण्टर के उस मशहूर गाने के साथ अपनी बात ख़त्म करती हूँ, जो मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में से एक है - Sing, sing a song

Sing out loud, sing out strong
Sing of good things, not bad
Sing of happy, not sad
Sing, sing a song
Make it simple to last your whole life long
Don't worry that it's not good enough
For anyone else to hear
Just sing, sing a song

Friday, September 5, 2008

मुशर्रफ का पाकिस्तान और मिट्टी के बुद्ध

मेरा पैन शांत था,और दिमाग सुस्त। व्यवस्तता के बाद ज़िंदगी धीरे धीरे पटरी पर लौट रही थी। मैं सोच रही थी कि मुझे मुशर्रफ के नाम के साथ अपनी सीरिज़ जारी रखनी चाहिए या नहीं। मैंने सोचा कि ये ठीक है,और आखिरकार लिखने का फैसला कर डाला। हालांकि,मुशर्रफ का अध्याय अब पाकिस्तान में बंद हो चुका है,लेकिन मुशर्रफ की अपनी शख्सियत है, और अच्छी व बुरी वजहों से वो पाकिस्तान के राजनैतिक इतिहास में कभी न मिटने वाला अध्याय है। वैसे,एक वजह और भी है लिखने की। दरअसल, पाकिस्तान की मेरी सभी यात्राएं मुशर्रफ के काल में ही हुई हैं।

पिछले कुछ महीने,भारत और पाकिस्तान के लिए अस्थिरता और सरगर्मी भरे रहें हैं। राजनीतिक अस्थिरता लगातार पाकिस्तान में परेशानी का सबब बनी हुई है। उस पर आतंकवादी हमलों की कुछ वारदातों ने माहौल और बिगाड़ा है। और भारत में बिहार की भयंकर बाढ़ के बीच शायद ही कोई आखिरकार हुए अमरनाथ समझौते पर राहत महसूस कर पाया। इस समझौते के बाद जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते दिख रहे हैं। लेकिन, इन्हीं उठापटक और सरगर्मियों के बीच रमज़ान और गणेशोत्व के पवित्र दिन शुरु हो गए। बस,सीमा के इस और उस पार के हज़ारों भक्तों ने खुद का ईश्वर के सामने समर्पण कर दिया और शांति-समृद्धि के लिए दुआएं मांगी। मुझे इस वक्त वो बेहद आध्यात्मिक अनुभव याद आ रहा है,जो मुझे एक पाकिस्तान यात्रा के दौरान हुआ था।


मैं भारत और पाकिस्तान के बीच एक और वार्ता को कवर करने के लिए पाकिस्तान में थी। लगातार दो दिनों की बातचीत के बाद,वार्ता सफल हुई और आखिरकार हमें भी खुद के लिए कुछ वक्त मिल गया। हम सभी भारतीय पत्रकारों ने इस वक्त का सदुपयोग 'प्राचीन भारत' यानी पाकिस्तान के शहर तक्षशिला को देखना तय किया। इस्लामाबाद से पश्चिम में करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर तक्षशिला है। दिलचस्प है कि स्थानीय लोग तक्षशिला को बड़े ही अज़ीब ढंग से उच्चारित करते हैं-टैक्सला। और,जब भी कोई टैक्सला कहता तो मैं अपनी दबी हुई हंसी छुपा नहीं पाती थी। हमें दोपहर में वहां जाना था,और तब तक मैंने होटल में ही रुकना तय किया था। मैं यह सोचकर ही बहुत रोमांचित थी कि थोड़ी देर में मुझे प्राचीन भारत के एक अहम शैक्षिक केंद्र पर जाना था। चाय के कई गर्म प्याले गटकते हुए मैंने उस सेंटर के बारे में तमाम कल्पनाएं कर डाली,जहां कभी चाणक्य जैसा टीचर हुआ करता था। विचारों की यह प्रक्रिया मुझे कल्पना में ही सैकडों साल पीछे ले गई,जब मौर्य वंश का राज हुआ करता था,और अशोक जैसा राजा राज करता था। उन्हीं के काल में तक्षशिला बौद्ध शिक्षा का अनूठा केंद्र बना था।


मेरी इस कल्पना यात्रा में दरवाजे पर बजी एक घंटी ने दखल दे डाला। ये हाउसकीपिंग वाले की घंटी थी। उसने मुझे कुछ दिखाने की इजाज़त मांगी,जो वो बड़ी बेताबी से शायद मुझे दिखाना चाहता था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वो अजनबी शख्स मुझे क्या दिखाने को बेकरार है। बहुत अनमने भाव से मैंने उससे कहा, ले आओ। वो कुछ देर में वापस आ गया। उसके हाथ में शानदार ढंग से पैक की गई तीन-साढ़े तीन इंच की कोई चीज थी। उसने मुझसे कहा कि इस कमरे में तीन साल पहले एक शख्स यह छोड़ गया था। और उसे कमरा साफ करते हुए ड्रॉवर में यह चीज मिली थी। मैंने उससे सीधा सवाल किया कि वो कैसे समझ रहा है कि मैं ही इस चीज़ को लेने के लिए ठीक हूं तो वो मुस्कुराया और चल दिया। सलीके से लिपटी इस चीज को हाथ में लेकर मैं घूरने लगी। काफी देर सोचने के बाद मैंने सोचा कि इसे अब खोल ही लिया जाए। और,जैसे ही कागज़ में लिपटी वो चीज़ बाहर आयी,मैं दंग रह गई। यह चिकनी मिट्टी के बने नन्हें बुद्धा की मूर्ति थी। मैं काफी वक्त तक असमंजस में थी कि क्या कहूं। लेकिन,दिन में हम तक्षशिला गए। विश्वविख्यात यूनिवर्सिटी का यह शहर अब बिलकुल बर्बाद हो चुका है। हालांकि, उस दौर की कई चीज़ें अभी भी म्यूजियम में सुरक्षित रखी गई हैं। यह हमारे लिए बेहद शानदार बौद्धिक और आध्यात्मिक अनुभव था। हम सभी ने इस अनुभव का भरपूर आनंद लिया और वापस अपने दौर में आ गए। और हां, चिकनी मिट्टी की इन बुद्धा ने मेरे साथ भारत तक यात्रा की।आज यह मेरे मंदिर में शान से विराजे हुए हैं।

Monday, August 25, 2008

क्या कश्मीर आंदोलन वास्तव में कश्मीरियत के लिए है?

किसी आंदोलन का आधार क्या है? पहचान की एक संयुक्त बुनियाद, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी या पारंपरिक समता की नींव। लेकिन, अगर कोई जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बीच इन्हीं आधारों पर (जैसा अलगाववादी कहते हैं-कश्मीर आंदोलन) समानता की बात करता हैं,तो लोगों को बहुत सी गलत सूचनाएं मिलेंगी। दरअसल, 'कश्मीर' में अलगाववादी (कश्मीर का मतलब सिर्फ कश्मीर,जिसमें जम्मू,लद्दाख का हिस्सा शामिल नहीं होता) कश्मीरियत की बात करते हैं,और इसे ही अपने आजादी के आंदोलन का आधार बताते हैं।

लेकिन,इस मसले पर आगे बात करने से पहले यह जानना जरुरी है कि कश्मीरियत का मतलब क्या है? दरअसल, महाराष्ट्रवाद,पंजाबवाद और तमिलवाद की तरह कश्मीरियत भी एक छोटे से हिस्से के लोगों की साझी सामाजिक जागरुकता और साझा सांस्कृतिक मूल्य है। अलगाववादियों और कश्मीर के स्वंयभू रक्षकों के मुताबिक कश्मीर घाटी में रहने वाले हिन्दू और मुसलमानों की यह साझा विरासत है। लेकिन, सचाई ये है कि जम्मू,लद्दाख और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पूरे हिस्से और घाटी के बीच कोई सांस्कृतिक समानता नहीं है। तर्क के आधार पर फिर यह कश्मीरियत से मेल नहीं खाता। दरअसल, सचाई ये है कि जम्मू और कश्मीर की संस्कृति में कई भाषाओं और पंरपराओं को मेल है, और कश्मीरियत इसकी विशाल सांस्कृतिक धरोहर का छोटा सा हिस्सा है।

अक्सर, खासकर हाल के वक्त में, अलगाववादी नेता या महबूबा मुफ्ती को हमने कई बार मुजफ्फराबाद, दूसरे शब्दों में सीमा पार के कश्मीर, की तरफ मार्च का आह्वान करते सुना है। लेकिन, हकीकत ये है कि इस पार और उस पार के कश्मीर में कोई सांस्कृतिक, भाषायी और पारंपरिक समानता नहीं है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रहने वाले मुस्लिम समुदाय का बड़ा तबका रिवाज और संस्कृति के हिसाब से उत्तरी पंजाब और जम्मू के लोगों के ज्यादा निकट है। जिनमें अब्बासी, मलिक, अंसारी, मुगल, गुज्जर, जाट, राजपूत, कुरैशी और पश्तून जैसी जातियां शामिल हैं। संयोगवश में इनमें से कई जातियां पीओके में भी हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अधिकृत भाषा उर्दु है, लेकिन ये केवल कुछ लोग ही बोलते हैं। वहां ज्यादातर लोग पहाड़ी बोलते हैं,जिसका कश्मीर से वास्ता नहीं है। पहाड़ी वास्तव में डोगरी से काफी मिलती जुलती है। पहाड़ी और डोगरी भाषाएं जम्मू के कई हिस्से में बोली जाती है।

हकीकत में, दोनों तरफ के कश्मीर में सिर्फ एक समानता है। वो है धर्म की। दोनों तरफ बड़ी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। तो क्या यह पूरी कवायद, पूरा उबाल धार्मिक वजह से है? इसका मतलब कश्मीरियत की आवाज,जो अक्सर कश्मीर की आज़ादी का नारा बुलंद करने वाले लगाते हैं,वो महज एक सांप्रदायिक आंदोलन का छद्म आवरण यानी ढकने के लिए है। और अगर ये सांप्रदायिक नहीं है, तो क्यों कश्मीरियत की साझा विरासत का अहम हिस्सा पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित इस विचार के साथ नहीं हैं, और दर दर की ठोकर खा रहे हैं। विडंबना ये है कि भाषा,रहन-सहन-खान पान और सांस्कृतिक नज़रिए से कश्मीरियत की विचारधारा में जो लोग साझा रुप में भागीदार हैं,वो कश्मीरी पंडित ही अब घाटी से दूर हैं।

Thursday, August 21, 2008

बीती रात रस्किन बॉण्ड मेरे सपने में आए

मुशर्रफ के गली कूचे की यात्रा में रुकावट में लिए मुझे माफ करें। (वैसे,मैंने पहले ही आपको चेतावनी दी थी।)। दरअसल, आज मैं रस्किन बॉंड के बारे में बात करना चाहती हूं, जिन्हें मैंने कल सपने में देखा। सपने में, मैं एक बाइट लेने के लिए उनका पीछा कर रही थी, और एक भले इंसान की तरह रस्किन बॉंड ने मुझे बाइट दी भी।

वैसे,आपमें से ज्यादातर लोग रस्किन बॉण्ड के बारे में जानते ही होंगे। फिर भी, अगर कुछ लोग नहीं जानते, तो उनके लिए इस मशहूर और प्यारे से लेखक का छोटा सा परिचय जरुरी है। जन्म से ब्रिटिश, और शौक से भारतीय रस्किन बॉंड ने अपना पूरा जीवन लेखन को समर्पित कर दिया। वो गढ़वाल की ऊंची पहाड़ियों पर मसूरी में बने अपने घर से लिखते हैं, और वो वहां पिछले 45 साल से रह रहे हैं। मैंने सबसे पहली बार रस्किन को अपने स्कूली दिनों में पढ़ा था। उन्होंने बच्चों के लिए बहुत लिखा है। कहानियां, लघु कहानियां, नॉवल पूरे देश में स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा रहे हैं। मैं स्कूली दिनों से ही उनकी फैन हूं और उनकी कहानियां मुझे बहुत अच्छी और भावपूर्ण लगती थीं, लेकिन मैं उनकी जबरदस्त फैन बनी उनके निबंध और डायरी के अंशों खासकर रेन इन द माउंटने में संग्रहित अशों की वजह से। मुझे ये किताब अपने कॉलेज के फर्स्ट इयर में मिली थी। दिल को जीतने वाली सादगी और कहने के बेहद खूबसूरत अंदाज ने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया। वो पेड़ों से,पहाड़ों से,घाटी से और आम लोगों से बात करते हैं। सब सामान्य हैं,लेकिन उनका अंदाज कहीं गहरे तक पाठक को भेद जाता है। उन्हें पढ़ते वक्त मेरे भीतर भी नाटकीय तौर पर बहुत कुछ बदल गया। इससे मुझे सामान्य चीजों में छिपे करिश्में, उसकी असमान्यता और प्रकृति की अहमियत का पता चला। मैंने उनके कुछ अंश बार बार, कई बार पढ़े। उनके लेखन ने मेरी कल्पनाओं को पंख लगाए और मैंने खुद से यह वादा किया कि एक दिन मैं भी उनकी तरह लिखूंगी।

तो ये है रस्किन बॉंड के लेखन का प्रभाव। लेकिन, बहुत विनम्र रस्किन इसे स्वीकार करने में काफी संकोची हैं। दरअसल, उनका अपने बारे में कहना है" लेखकों में मैं बहुत बड़ा लेखक नहीं हूं। मैं बहुत सामान्य भले न हूं। मैं बस खुद को किसी समुद्री बीच पर चमकते हुए कंकड़ की तरह देखना चाहता हूं। लेकिन, मैं चाहता हूं कि मैं एक रंगीन कंकड़ बनूं कि लोग मुझे उठाएं, कुछ देर हाथ में पकड़कर खुशी महसूस करें और शायद कभी कभार अपनी जेब में भी डाल लें। अगर,किसी को परेशानी होती है तो वो मुझे फिर समुद्र में फेंक दे। शायद,कोई लहर मुझे फिर बीच पर लाकर पटक दे,और फिर कोई मुझे दोबारा उठा ले। (रस्किन ,अवर एंड्यूरिंग बॉंड से अंश)"

रस्किन बॉड से मेरी पहली और इकलौती मुलाकात खासी नाटकीय थी। दस साल पहले, मैं कुछ दोस्तों के साथ मसूरी गई थी। जुलाई का महीना था,और बरसात शुरु ही हुई थी। पहाड़ों ने छटा अद्भुत थी, और जैसा रस्किन लिखते हैं "one could watch from the window trees dripping and the mist climbing the valley" (quote from the book, RUSKIN, OUR ENDURING BOND). मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा से मिलने के लिए ये सही योजना थी। लेकिन कैसे? यही सबसे बड़ा सवाल था। मैं मसूरी में उनके रहने वगैरह के बारे में बिलकुल नहीं जानती थी, और न ही मैं ऐसे किसी शख्स को जानती थी,जो मुझे उनके बारे में सही जानकारियां दे सके। मैं उस वक्त कॉलेज में थी,और ज्यादा संपर्क भी नहीं थे। मैंने 'रेन इन द माउंटेंस' में पढ़ा था कि वो इवे कॉटेज नाम की किसी जगह पर किराए पर रहते हैं। लेकिन,ये किताब भी कुछ साल पहले लिखी गई थी। रस्किन वहां से कई और जा सकते हैं ! लेकिन,मेरे पास इसके अलावा कोई दूसरी जानकारी भी तो नहीं थी लिहाजा मैंने अपने दोस्तों को साथ लेकर उस बरसाती दोपहर में मिशन रस्किन शुरु कर डाला। स्थानीय लोगों से पूछते पाछते इवी कॉटेज की तरफ जाने वाले पहाड़ी रास्ते पर चलना शुरु किया। मुझे उस वक्त बरसात की बिलकुल परवाह नहीं थी, लेकिन उस वक्त इस टॉर्चर के लिए मेरे दोस्त मुझसे खासे खफा थे। मैं ये बात उनके चेहरों पर साफ पढ़ सकती थी। लेकिन, एक बार जब हम इवी कॉटेज पहुंचे ,तो उन्होंने सीढ़ियों पर चढ़ने से ही इंकार कर दिया,जहां रस्किन अपने गोद लिए परिवार के साथ रहते थे। उन्हें नीचे छोड़कर,और भारी आशंकाओं के बीच मैंने दरवाजा खटखटाया। मन में सवाल था कि क्या होगा अगर वो यहां नहीं रहते हुए? क्या होगा अगर उन्हें मेरा बिना इजाजत लिए आना अच्छा नहीं लगा? मैं बहुत नर्वस थी। रस्किन के एक पोते ने दरवाजा खोला । मैंने उन्हें अपने आने की वजह बतायी। उसने मुझसे इंतजार करने को कहा और अंदर चला गया। कुछ पल बाद, रस्किन बॉंड खुद दरवाजे पर आए। जी हां, बिलकुल वही थे-बिलकुल जीते जागते। मैं बिलकुल चुप थी,और उन्हें देखे जा रही थीं। मेरे संकोच को भांपते हुए रस्किन ने चुप्पी तोड़ी, और बस यही से हमारी बातचीत शुरु हुई।

'Yes, young lady?'

'Sir, I am a huge fan of your writings. I came all the way from Delhi to meet you. I hope , I didn't disturb you.'

'Well, I was having my lunch! You came all by yourself?'

'No Sir, with a few friends.'

'Where are they?'

'They're waiting downstairs. They were too scared to come up.'

'What? You left them outside in the rain. Call them up.'

थोड़ी देर में मेरे बाकी दोस्त भी ऊपर आ गए। हमने थोड़ी ही देर रस्किन से बात की,लेकिन ये मुलाकात कभी न भूलने वाली थी।

बहरहाल, मैं बीती रात के अपने सपने पर आती हूं। मैं जब सुबह जागी,तो मुझे भाई की तरफ से एक सरप्राइज गिफ्ट मिला। उसने मेरे लिए रस्किन बॉड की एक किताब खरीदी थी। और, यकीं मानिए कि इस किताब पर ऑटोग्राफ थे-खुद रस्किन बॉड के। दरअसल, दिल्ली के एक मशहूर बुकसेलर ने "रस्किन बॉण्ड से मिलिए" कार्यक्रम का आयोजन किया था। और, मेरा भाई,जब उस बुकस्टोर के पास से गुजर रहा था,तभी उसे रस्किन की एक झलक मिल गई । रस्किन उस वक्त अपने प्रशंसकों को अपने ऑटोग्राफ दे रहे थे। रस्किन के लिए मेरी दीवानगी से परिचित मेरे भाई ने एक किताब पर मेरे लिए भी रस्किन से ऑटोग्राफ ले लिए। और विश्वास कीजिए,जब से इस किताब को मैंने हाथ में लिया है, मैं मुस्कुरा रही हूं।

To conclude, in Ruskin's own words, 'Life has not exactly been a bed of roses, yet, quite often, I have had roses out of season.'( from the book, RUSKIN, OUR ENDURING BOND)

Friday, August 15, 2008

मुशर्रफ़ के पाकिस्तान के गली-कूंचे

मैं जैसे ही इस पोस्ट को लिखने बैठी, न्यूज चैनलों ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के आखिरकार इस्तीफा देना तय कर लेने की खबरों के बीच लाहौर में आत्मघाती हमले की ब्रेकिंग न्यूज चलानी शुरु की। बस, यहीं मुझे पिछली पोस्ट में लिखा सुशांत का कमेंट भी याद आ गया। सुशांत, आप बिलकुल सही हैं। मुशर्रफ के बाद के पाकिस्तान को लेकर तमाम आशंकाएं हैं। इस पर बड़ा सवालिया निशान है कि क्या मुशर्रफ के जाने का सही मतलब पाकिस्तान में सही मायने में लोकतंत्र की स्थापना है या अब कट्टरपंथियों और जेहादी ताकतों को अपना काम करने के लिए पाकिस्तान के रुप में सही मैदान मिल गया है। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस बाबत पहले की अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। हम केवल आशा कर सकते हैं कि वहां जो कुछ हो, वो दोनों देशों और यहां के लोगों के भले के लिए हो।

मेरी पिछली पोस्ट में अनुराग ने लिखा था कि मैं ब्लॉग पर पाकिस्तान के बारे में,वहां के लोगों के बारे में और वहां अपने अनुभवों के बारे में और लिखूं। इतनी सारी बातों को एक पोस्ट में लिखना मुमकिन नहीं है लिहाजा मैंने सोचा है कि मैं एक के बाद एक अपने अनुभव लिखती रहूं। हां, ये जरुरी नहीं है कि ये सब एक क्रम में हों क्योंकि जैसे जैसे मैं यादों के सागर में डुबकी लगाऊंगी,बातें याद आएंगी और मैं उन्हें लिख डालूंगी। मुझे उम्मीद है कि आप इस 'बंपी राइड' का भी लुत्फ लेंगे।

पाकिस्तान 2003 की गर्मियों तक मेरे लिए पूरी तरह एक रहस्य था( एक मायने में ये अब भी है)। इराक के युद्ध के मैदान में तब्दील होने के बाद मुझे मौका मिला कि मैं वहां के पड़ोसी मुल्कों में जा पाऊं। दिसंबर 2001 में संसद पर हमले के करीब डेढ़ साल बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी । इससे भी ज्यादा दोनों देशों में रह रहे लोगों को राहत देने की प्रक्रिया,शांति के लिए नए कदम या कूटनीतिक शब्दों में विश्वास बनाने की कवायद( कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स) की हर तरफ से शुरु हो गई थी। दोनों देशों ने दिल्ली और लाहौर के बीच अरसे से बाधित बस सेवा शुरु करने की घोषणा की, और दोनों देशों के पत्रकारों को सदा-ए-सरहद की मुफ्त सवारी करायी गई। इन सदस्यों में मैं भी एक थी। ऐतिहासिक मौके का गवाह बनने की उत्तेजना और रोमांच से लबालब मैंने इस मौके का पूरा लुत्फ लिया। हमें 530 किलोमीटर लंबी इस यात्रा को पूरा करने में करीब आठ गंठे लगे। मुझे याद है कि देर शाम को बस ने वाघा बॉर्डर पार किया तो वहां मौजूद लोग खुशी से झूम उठे थे।