Wednesday, January 7, 2009

आध्यात्मिक यात्रा - १

मैंने पिछले कुछ हफ़्तों में पाँच यात्राएँ कीं... बहुत ही भागदौड़ भरा वक़्त रहा। हाँ, पिछले महीने में मेरा ज़्यादातर समय सफ़र करते हुए ही गुज़रा, कभी काम के लिए और कभी निजी कारणों से। इसकी शुरुरात दिसम्बर के पहले हफ़्ते में अमृतसर की यात्रा के साथ हुई, हालाँकि अमृतसर जाने की मेरी कोई योजना नहीं थी। कुरुक्षेत्र की एक तेज़ ट्रिप तय थी। लेकिन वहाँ हमारा काम जल्दी ही ख़त्म हो गया, और जैसा कि होनी को मंज़ूर था, हमें मील का पत्थर नज़र आया जिसपर लिखा था – “अमृतसर 380 किमी”। मैंने अपने अन्दर कुछ महसूस किया, जिसे मैं अब ‘दरबार साहब’ (स्वर्ण मंदिर) का खिंचाव कहती हूँ। और हमने तुरंत पवित्र नगरी अमृतसर जाने का फ़ैसला किया।

यह लंबी, लेकिन सुखद यात्रा थी और हम शाम से पहले इस प्राचीन नगरी में पहुँच चुके थे। हम दरबार साहब के पास एक होटल में ठहरे और अगले रोज़ सुबह पवित्र मंदिर के दर्शन का फ़ैसला किया। रात को अमृतसर की गली-कूँचों का सफ़र हमें इतिहास के उस दौर में ले गया, जब इस शहर ने विभाजन का ख़ून-ख़राबा और हिंसा नहीं देखी थी। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ वैसे-का-वैसा ही है, लेकिन फिर भी सब कुछ बदल चुका है। साफ़ तौर पर एक तरह की शांति और सन्नाटे ने शहर को घेर रखा था। हालाँकि बीच-बीच में कभी-कभार कोई मॉल या मैकडोनाल्ड्स दिख रहा था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि शहर अपनी थाती और पुराने आकर्षण को बचाने में क़ामयाब रहा है।

सामूहिक कार्य या ‘सेवा’ सिख धर्म के केन्द्र में है और इसीलिए अगली सुबह जब हम दरबार साहब के द्वार से गुज़रे तो हमने सिख महिला-पुरुषों को, जिनमें युवा और बुज़ुर्ग दोनों शामिल थे, संगमरमर के रास्ते को दूध और पानी से धोते हुए देखा। भव्यता और वैभव के तेज से घिरा हुआ स्वर्ण मंदिर पवित्र कुंड के चमकते हुए पानी के बीचों-बीच नज़र आ रहा था। इस पवित्र जगह का पूरा वातावरण ग्रंथियों द्वारा किए जा रहे गुरु ग्रंथ साहब के पाठ के स्वरों से गूंज रहा था।

ऐसी मान्यता है कि अपनी देह त्यागने से पहले दसवें सिख गुरू, गुरू गोविन्द सिंह ने अपने अनुयायियों से कहा था कि उनके बाद कोई भी जीवित गुरू नहीं होगा और उन्हें गुरू ग्रन्थ साहब (पवित्र सिख धार्मिक पुस्तक) का अनुसरण करना चाहिए। इसके बाद यह पुस्तक न सिर्फ़ सिखों का धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि दसों गुरुओं का जीवित स्वरूप भी माना जाता है। गुरू ग्रंथ साहब में क़रीबन एक हज़ार से भी ज़्यादा पृष्ठ हैं, जिनमें धार्मिक शिक्षा, अच्छे जीवन के लिए पथप्रदर्शन और छन्द हैं। इन छन्दों और शिक्षाओं को ‘गुरुबाणी’ या ‘गुरुओं के शब्द’ भी कहा जाता है। सिखों के लिए ग्रंथ साहिब एक जीवित संत की तरह है और इसलिए हर सुबह इसे गद्दी पर बैठाया जाता है और रात में बिस्तर पर रखा जाता है।

हमने सुबह समारोह को श्रद्धा के साथ देखा, सिर झुके हुए थे और आँखे प्रार्थना में आधी बंद थीं। सूर्योदय में अभी भी कुछ वक़्त था और हम ख़ूबसूरती से जगमगा रहे पवित्र कुण्ड के शांत जल के नज़दीक बैठे हुए थे। तब मैंने विश्वास और धर्म की उस असाधारण ताक़त को महसूस किया, जो मनुष्य की आत्मा को तरोताज़ा और शांत करती है। हालाँकि दरबार साहब सिख धर्म-स्थल है, लेकिन भारत की हर जाति-मज़हब-पंथ के लोग यहाँ आते हैं और यहीं मैंने कुछ युवा बौद्ध भिक्षुओं के तस्वीर खिंचाने का आनन्दित करने वाला नज़ारा भी देखा। उनके ख़ुशी और उत्साह से भरे चेहरों में मैंनें सभी धार्मिक मतभेद के मुद्दों को ग़ायब होते हुए देखा, और इसलिए मुझे लगता है कि भले ही यह दिक़्क़त से भरा हो, लेकिन यही हमारे देश की सबसे बड़ी ताक़त भी है।

बाद में हम एक अलग तरह की तीर्थयात्रा पर निकले। दरबार साहब से कुछ ही दूरी पर जलियाँवाला बाग़ है। सुबह की भीड़-भाड़ वाली गलियों में हमने छोटी दूरी को साइकिल रिक्शा के ज़रिए तय किया। रिक्शे वाला एक बुज़ुर्ग सिख था, जिसकी लम्बी-सी सफ़ेद दाढ़ी थी। उन्होंने हमें बताया कि उनके एक चाचा भी उस क्रूर हत्याकाण्ड में शहीद हो गए थे और आज भी उनका पूरा ख़ानदान एक नायक की तरह उनको याद करता है।

इस ऐतिहासिक स्थल के बाहर ही यह बोर्ड लगा है – ‘यह भूमि लगभग दो हज़ार देशभक्त पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के ख़ून से पवित्र हुई है।’ मेरी धड़कन एक पल के लिए थम-सी गयी और मैंने गहरी साँस ली। आँखें बंद करके मैंने तक़रीबन अस्सी-नब्बे साल पहले के उन हिंसा से भरे आतंकित करने वाले लम्हों को याद करने की कोशिश की, जब ब्रिटिश फ़ौजी कमांडर जनरल डायर ने अपने सैनिकों को बिना समझे-बूझे बेगुनाह और मासूम औरतों, मर्दों और बच्चों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। उनकी ग़लती महज़ इतनी ही थी कि वे वहाँ शांतिपूर्ण ढंग से आज़ादी की मांग के लिए सभा कर रहे थे। रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक चली और इस छोटे-से दौर में लगभग सोलहसौ राउण्ड गोलियाँ दाग़ी गईं। अभी भी दीवारों पर उन गोलियों के निशानों को आसानी से देखा जा सकता है, जिनके चारों ओर ध्यान-से गोला बनाया गया है। बाग़ का एकमात्र दरवाज़ा बंद कर दिया गया था और जो बेचारे अन्दर बन्द थे उनके निकलने का कोई रास्ता नहीं था। हमने वो कुँआ भी देखा जिसमें गोलियों से बचने के लिए कई लोग कूदे और अंतहीन गहराही में समा गए। और जब मैंने उस कूँए में भीतर झांक कर देखा, तो मदद के लिए पुकारती आवाज़ों की गूंज को महसूस किया। वे सभी हमारी आज़ादी की लड़ाई के बिसरे हुए नायक थे और उनकी शहादत के स्थल पर जाना किसी तीर्थयात्रा करने की ही तरह महसूस हुआ।

पुनश्च – मेरी तरफ़ से अपने सभी साथी चिट्ठाकारों और पाठकों को नए साल की बहुत-बहुत बधाई।

11 comments:

अल्पना वर्मा said...

aap ko bhi naye saal ki bahut badhayeeyan.

aap ki yatra ka vivran padha..nayee jaankari milin.
jaliyanwala bagh ke bare mein kitabon mein hi padha hai..aaj aap se us sthan ke baare mein aur jaana.
aage ki yatra ka haal janNe ki utsukta hai.
dhnywaad

SATYENDRASHALABH said...

SHEETAL HAPPY NEW YEAR 2009
MUJHE JANKARI MILI HAI KI AAP MERE RELATION ME HAI. KYA AAPKA KUCHH RISHTA OEL DHAKWA GARHI DISTT. LAKHIMPUR KHERI , U.P. SE HAI ? KINDLY REPLY
MAI LUCKNOW STF ME ADD.S.P. KE PAD PER TAINAAT HU.
SK SINGH

IRFAN said...

hi sheetal
tumhen yahan maine pehli baar padha.da asal main bhi is 'duniya' mein 10-12 dino se hi aaya hoon.
mera blog cartoonistirfan.blogspot.com dekhna .kaisa lagta hai bataana.tumahara varnan bahut jaankari wala hai..har bar ki tarah.Badhaayi.

सागर नाहर said...

एक बार फिर बढ़िया पोस्ट!
बहुत रोचक शैली में लिखती हैं आप, मानो हम आपके साथ साथ उन सभी जगहों पर यात्रा कर रहे हों।

ambrish kumar said...

यात्रा से ज्ञान भी मिलता है.

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

शितलजी
सबसे पहले आपको नव वर्ष कि शुभ कामनाये। आपने नये वर्ष मे यह अच्छा कार्य किया कि दो पवित्र स्थानो कि यात्रा कि। हम आपका अनुमोदन करते है ताकि इसका थोडा फल हमे भी मिल जाये।

जय हिन्द।

HEY PRABHU YEH TERA PATH
http://ombhiksu-ctup.blogspot.com/
ctup.bhikshu@gmail.com

विनीता यशस्वी said...

Sheetak ji apki yatra par ke bahut achha laga.

chopal said...

साहित्य की एक सशक्त विधा है यात्रा वृतांत, जिसके माध्यम से लेखक न केवल स्थान विशेष की जानकारी देता है अपितु उस स्थान का ऐसा वर्णन करता है कि पाठक को लगता है कि वह स्वयं उस यात्रा पर गया था। वाकई में आप एक उत्कृष्ठ पत्रकार होने के साथ-साथ एक सशक्त लेखिका भी हैं।
http://merichopal.blogspot.com/

creativekona said...

Sheetal ji,
Apko bhee naye varsh kee dheron shubhkamnayen.Apne naye sal men post kee shuruat bhee bahut achchhe yatra vrittant se kee hai.
Yatra karna ek bahut achchha shauk hai.lekin us pooree yatra ko shabdon ke madhyam se logon tak pahunchana thoda kathin hota hai.Kyonki yatra ke dauran hamen dheron anubhav hote hain.Unmen se kise likhen....kise chhoden is antardvand se bhee lekhak ko gujarna padta hai.
Par apka ye lekh bahut saral ,pravahmayee bhasha men likha gaya hai.Badhai.Is ummeed ke sath ki iskee aglee kadee jald hee padhne ko milegee.
Hemant Kumar

Rajak Haidar said...

हैलो शीतल राजपूत
सुन्दर प्रस्तुति. अत्यंत ही सुन्दर लफ्जों का समावेश. बहुत अच्छा लिखती हैं आप. यूं लगा जैसे हम भी आपके साथ यात्रा कर रहें हों. मैं तो आपकी पहली पोस्ट श्रीगणेश पढ़कर ही आपका मुरीद बन गया हूं. पहले मैं सोचता था कि टीवी पत्रकारों की भाषा इतनी अच्छी नहीं होती है. लेकिन आपको पढ़ने के बाद मुझे यह धारणा बदलनी पड़ी। आपसे एक शिकायत भी है. आप नियमित नहीं लिखती हैं. ब्लाग के पाठकों को आप लम्बा इंतजार करवाती है. मैं उम्मीद करता हूं आप हमारी शिकायत को दूर करने का प्रयास करेंगी। शब्बा खैर.

RAM__virma ram said...

Apne lambe arse ke bad likha, lekin behtarin yatra virtant. Dharma aur etihasik sthalon ki apni mahatta ko apne bakhoobi bayan kiya. Dharma adhyamikta aur astha ka strot hai. Har dharma ki apni sundrata hai lekin dharma ke kathit dekedaron ne is sundarata par dag lagane ki har sambhav koshish ki hai. To etihasik sthal sarkari aur aam admi ki upeksha ke shikar ban gaye. Amritsar ki bhoomi aur logon ki tariff karni hogi, Jaliawala kand, 1947 ki trasadi, ya phir 1984 ki ghatna aur uske bad ka charampanth ka daur, Amritsar har bar ubar kar aaya hai aur bhaichare aur aman ki missal kayam ki hai. Jaisa ki apne likha hi hai.

Ummid hai ki aap naye saal mein aur behtarin blog “niymit” roop se likhenge.shukriya

RAM - JNU