Wednesday, November 12, 2008

हाऊ की याद!

नवम्बर आ चुका है और साथ में सर्द सुबह और ठण्डी शाम ले आया है। ऊनी कपड़े अभी तक पूरी तरह बाहर नहीं आए हैं, लेकिन एक पतली शॉल अब ज़रूरी हो गई है। सबेरे बिस्तर की आरामदेह गर्माहट को छोड़कर उठना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। सुबह की चाय की पहली प्याली का असर जल्दी ही ख़त्म हो जाता है और मुझे जल्दी ही एक और प्याली चाय लेनी पड़ती है! मैं अपनी शॉल की गर्माहट में दुबकी हुई बैठती हूँ, उंगलियाँ कम को मज़बूती से पकड़े होती हैं और जब मैं अपनी बालकनी से बाहर झांकती हूँ, तो मन दशकों पहले की उन सर्द सुबहों में चला जाता है जब मैं जम्मू में स्कूल की छात्रा थी।

अचानक मेरी यादों के फ़्लैशबैक में हाऊ ज़िन्दा हो उठती है। हाऊ पतली-दुबली, छोटी-सी, क़रीब पचास साल की महिला थी। वह हमारे घर में साफ़-सफ़ाई वगैरह का काम किया करती थी। बरसों की कड़ी मेहनत ने उसके चेहरे को झुर्रियों से भर दिया था, हालाँकि उसके बाल तब भी बिल्कुल काले थे, एक भी सफ़ेद तिनके की झलक उनमें नहीं थी। मूलतः वह जम्मू से मीलों दूर बिलासपुर की रहने वाली थी। सालों पहले उसके पति ने उसे और उसके तीन बच्चों को किसी दूसरी औरत के लिए छोड़ दिया था। बिखर चुकी और लोगों के सवालों का सामना करने के लिए अकेली पड़ चुकी हाऊ ने शर्म और ग़रीबी से तंग आकर एक दिन अपने गांव को छोड़ दिया और बेहतरी की तलाश में जम्मू आ गयी, जहाँ उसके गांव के कई लोग छोटे-मोटे काम किया करते थे।

हमारा घर उन कई घरों में से एक था, जहाँ हाऊ काम किया करती थी। काम ख़त्म करके सुबह की चाय हमारे साथ लेना तक़रीबन रोज़ाना का काम था। और बहुत-सी ठण्डी सुबहों को वह अपने देस (गांव) के क़िस्से बड़ी अजीब-सी बोली में हमें सुनाया करती थी, जो मुझे ज़्यादा-कुछ समझ में नहीं आते थे। न ही वह मेरी भाषा ज़्यादा समझ पाती थी, लेकिन फिर भी अजीब बात यह है कि सब कुछ आसानी से कम्यूनिकेट हो जाता था। वह हर बात जो मैं कहती थी, उसपर वह अपना सर हिलाती थी और मुस्कुराते हुए कहती “हाऊ” (हाँ!)। इसलिए हम उसे हाऊ कहकर पुकारते थे! उसका असली नाम फूलबाई था।

हाऊ मुझे अपने गांव से बहने वाली नदी “महानन्दी” (महानदी) की कहानियाँ सुनाया करती थी और बरसात के दिनों की ख़तरनाक नदी के डरावने क़िस्से उनमें शामिल होते थे। उसने मुझे अपने पति और उसके परिवार की कहानियाँ भी सुनाईं। उसके ग़रीब माँ-बाप ने उसकी शादी तब ही कर दी, जब वह एक छोटी-सी बच्ची थी। जैसे ही वह अपनी शादी-शुदा ज़िन्दगी के सुखद शुरुआती दिनों की यादों में डूबती थी, उसकी आँखें चमक उठती थीं और उसकी मुस्कान सौ मील चौड़ी हो जाती थी। हाऊ का पति उससे उम्र में काफ़ी बड़ा था फिर भी उसने अपने पति की पूरे जी-जान से सेवा की, जबतक कि उसने हाऊ को उमर में और भी छोटी लड़की के लिए छोड़ नहीं दिया। उसकी आँखों की चमक को अब दुःख की छाया ढक लेती थी और वह अपने पति को कोसने लगती थी, वह अपने आँसुओं को भी शायद ही रोक पाती थी।

हाऊ हमेशा एक पतली-सी साड़ी पहनती थी जो वह कमर से कुछ इंच ऊपर बांधती थी और वह साड़ी सर्द-से-सर्द मौसम में भी शॉल की तरह उसके कंधों से लिपटी रहती थी। वह मोज़े नहीं पहनती थी, या कहें तो नए मोज़ों का ख़र्चा नहीं उठा सकती थी। मैंने के बार अपनी के पुरानी जोड़ी उसे दी भी, लेकिन उसने उसे कभी पहना नहीं। हमेशा के लिए दुःख सहने वाली त्यागी हिन्दुस्तानी औरत की तरह उसने उसे अपने सबसे छोटे लड़के को दे दिया। वह चाहती थी कि जब वो बड़ा हो तो पढ़-लिख कर बाबू बने। उसने उसे उन परेशानियों और मेहनत से दूर रखा, जिसका सामना उसे और उसके दो बड़े बेटों को हर पल करना पड़ता था। उसे अपने छोटे बेटे से बहुत आशाएँ थीं, लेकिन तब उसका दिल बुरी तरह टूट गया जब उसे पता लगा कि उसका “बिटवा” बुरी संगत में फँस गया है और बहुत ज़्यादा सिगरेट भी पीने लगा है।

मैंने आख़िरी बार उसे तब देखा था जब मैं घर गयी थी। वह और भी बूढ़ी हो चुकी थी और उसके बालों में कुछ चाँदी की लक़ीरें भी झलकने लगीं थीं, लेकिन उसकी मुस्कुराहट उतनी ही प्यारी और सब कुछ भुला देने वाली थी। “बिटवा” पूरी तरह बड़ा हो चुका था और हाँ, वो बाबू नहीं बन पाया था।

हाल में मैं चुनाव-पूर्व सर्वे के लिए छत्तीसगढ़ गयी थी और हमारा जहाज़ इस नवोदित राज्य के जंगलों और गांवों के ऊपर से गुज़र रहा था तो मैं हाऊ और महानदी की दहशत के बारे में सोच रही थी।

19 comments:

Neelima said...

शीतल जी , हाऊ से मिलकर अच्छा लगा !

makrand said...

accha vivran
do visit my post if have a time and do comment if feel so
regards

prabhat gopal said...

आपने एक महिला के संघषॆमय जीवन को बखूबी उकेरा है। हाऊ का पूरा व्यक्तित्व नजरों के सामने आ गया। हमारे देश में आज भी ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्हें अकेले दम पर जीवन से संघषॆ करना पड़ रहा है। पति और बेटे, जिन्हें उन्हें उनका सहारा बनना चाहिए था, वे भी बोझ बन जाते हैं। आपकी लेखनी से एक बात का ख्याल जरूर आया कि कम से कम हम अपने बूढ़े हो चुके मां-बाप का ख्याल जरूर रखें। आपने बेहतर लिखा है।

संगीता पुरी said...

एक तो गरीबी , उपर से समस्‍याएं ही समस्‍याएं , कैसे झेल पाती हैं वो ? आश्‍चर्य होता है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने हाऊ के साथ अनेक चरित्र हमारे मन में जीवित कर दिए।

virma said...

sheetaji bahut khoob
yeh sansmaran vakai dil ko chu lene wala hai. kal aur aaj ko jodkar likhne ka hunar gazab ka hai. apki kahani ne muje bhee mere registani gaon(the great thar desert) aur bachpan ki kai dhundhali pad chuki yadon ko zinda kar diya. apne karib 2 mahine bad likha hai, thoda smay nikal kar niymit likhte rahen.
shukriya,
RAM - JNU

चंद्रहीरा देवांगन said...

आपने हाऊ का चरित्र छत्तीसगढ की महिलाओं का चरित्र है.छत्तीसगढी मे यस के लिये हउ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.शीतल जी इस साल भी महानदी मे बाढ आय़ी थी.छत्तीसगढ की महिला पर लिखने के लिये धन्यवाद.

anil yadav said...

दिल को छू गई हाऊ की कहानी....

MEDIA WATCH GROUP said...

आपकी भाषा इतनी दिलकश है की बस। ठंड के ऐसा रूमानी वर्णन बहुत दिनों बाद पढ़ने मिला। दोनों ही भाषाओं मे ऐसा बेहतरीन नियंत्रण आपकी बड़ी उपलब्धि है। वैसे आपका पत्रकारिता का अनुभव भी बहुत समृद्ध है।। शुभकामनाओं सहित।

prakharhindutva said...

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्त रमन्ते तत्र देवता:

एसे आलेखों से मन में स्त्री सम्मान की भावना और प्रबल हो उठती है।

व्यस्त दिनचर्या से कभी समय निकाल कर हमारे ब्लॉग पर पधारें एवम् अपनी टिप्पणियाँ दें

www.prakharhindu.blogspot.com

sushant jha said...

अच्छा चित्रण...

aditya said...

शीतल जी ,

हाउ मैंने पढ़ी । कहने बेशक आपकी जिन्दगी से जुड़ी है । लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूँ की यह मार्मिक है, हमारे समाज में ऐसे कई हाउ हैं। खास तौर से आप जब भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर गौर करेंगे तो ऐसी कई घटनाए मिलेंगी। अच्छा प्रयास आपने किया है। मैं स्वभाव से भावुक किस्म का व्यक्ति हूँ इसीलिए मेरा मन ...

aditya said...

शीतल जी ,

हाउ मैंने पढ़ी । कहने बेशक आपकी जिन्दगी से जुड़ी है । लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूँ की यह मार्मिक है, हमारे समाज में ऐसे कई हाउ हैं। खास तौर से आप जब भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर गौर करेंगे तो ऐसी कई घटनाए मिलेंगी। अच्छा प्रयास आपने किया है। मैं स्वभाव से भावुक किस्म का व्यक्ति हूँ इसीलिए मेरा मन ...

पशुपति शर्मा said...

शीतल जी आपकी हाऊ की याद काफी पहले ही पढ़ चुका हूं... क्या आगे नहीं बढ़ना है... कई दिन हो गए कोई नई पोस्ट नहीं आई... क्या बात है... हाऊ को पढ़ते हुए मुझे भी अपने घर की दालवाली याद आ गई थीं... कभी उसके बारे में लिखूंगा... आपने मेरी ख्वाहिश को थोड़ा और बलवान कर दिया है...

अमिताभ said...
This comment has been removed by the author.
अमिताभ said...

शीतल जी ,
हमारे मध्य प्रदेश में (खास तौर से छिंदवाडा और महाराष्ट्र से सटे क्षेत्रों में ) भी "हाँ" के लिए "हव " "हो " "हओ " "हउ" का प्रयोग करते हैं ."हव क्या ?" (यानि हाँ क्या ?) कई दफे बड़े प्रेम से बोला जाता है . दिल्ली में पिछले सात सालों से हूँ लेकिन "हव " बोलना मैंने भी नही छोड़ा. मेरे दिल्ली यू पी बिहार हरियाणा और अन्य प्रान्तों के मित्र भी अब "हव" बोलना सीख गए हैं . देशज शब्द भले ही शुद्धता और मानक प्रयोगों की कसौटी पर खरे न उतरते हों लेकिन इनमें प्रेम का प्रवाह यकीनन होता है .मेरा मानना है ये शब्द दिल से निकलते है . जुबा तो बस माध्यम होती हैं. कई दफे हव का हऊ में ऊ बड़ा हो जाता है . आपकी हाउ के बहाने मैं भी अपनी यादों के गलियारों में घूम आया ...
आभार !!!

almighty bless you !!

with regards
amitabh

डुबेजी said...

SHEETAL JI SADAR NAMASKAR apka blog padha acha laga . aap mere blog par jaroor padhariye aur mere cartoons par apki tippani mere liye bahut valuable rahengi .regards

शिवराज गूजर. said...

man ko chhoo lene wali rachana hai sheetalji. shabdon ki aisi mala goonthi hai hau ke jeevan ki dor se ki padna shuru karte hi pathak ke samne hau ki tasveer ubhar jati hai or wo jeevant hokar apani kahani bayaan karne lagti hai.
badhai.

Sanjeet Tripathi said...

हौ, हव, हऊ, हउ।
ये सब जी, यस और हां के ही रूप हैं।

छत्तीसगढ़ को 'हाऊ' के और हवाई नज़रिए से तो देखा आपने, कभी धरातल पर आकर देखिए।
महानदी को भी और ऐसी ही न जाने कितनी 'हाऊ' को भी।

क्यों नहीं आप इस बात पर ही एक स्टोरी करतीं कि छत्तीसगढ़ की आदिवासी बालाएं कैसे, किस तरह ले जाकर महानगरों में बेची जा रही हैं, देह के बाजार से लेकर घर में काम करने वाली बंधक के रूप में।