Friday, September 5, 2008

मुशर्रफ का पाकिस्तान और मिट्टी के बुद्ध

मेरा पैन शांत था,और दिमाग सुस्त। व्यवस्तता के बाद ज़िंदगी धीरे धीरे पटरी पर लौट रही थी। मैं सोच रही थी कि मुझे मुशर्रफ के नाम के साथ अपनी सीरिज़ जारी रखनी चाहिए या नहीं। मैंने सोचा कि ये ठीक है,और आखिरकार लिखने का फैसला कर डाला। हालांकि,मुशर्रफ का अध्याय अब पाकिस्तान में बंद हो चुका है,लेकिन मुशर्रफ की अपनी शख्सियत है, और अच्छी व बुरी वजहों से वो पाकिस्तान के राजनैतिक इतिहास में कभी न मिटने वाला अध्याय है। वैसे,एक वजह और भी है लिखने की। दरअसल, पाकिस्तान की मेरी सभी यात्राएं मुशर्रफ के काल में ही हुई हैं।

पिछले कुछ महीने,भारत और पाकिस्तान के लिए अस्थिरता और सरगर्मी भरे रहें हैं। राजनीतिक अस्थिरता लगातार पाकिस्तान में परेशानी का सबब बनी हुई है। उस पर आतंकवादी हमलों की कुछ वारदातों ने माहौल और बिगाड़ा है। और भारत में बिहार की भयंकर बाढ़ के बीच शायद ही कोई आखिरकार हुए अमरनाथ समझौते पर राहत महसूस कर पाया। इस समझौते के बाद जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते दिख रहे हैं। लेकिन, इन्हीं उठापटक और सरगर्मियों के बीच रमज़ान और गणेशोत्व के पवित्र दिन शुरु हो गए। बस,सीमा के इस और उस पार के हज़ारों भक्तों ने खुद का ईश्वर के सामने समर्पण कर दिया और शांति-समृद्धि के लिए दुआएं मांगी। मुझे इस वक्त वो बेहद आध्यात्मिक अनुभव याद आ रहा है,जो मुझे एक पाकिस्तान यात्रा के दौरान हुआ था।


मैं भारत और पाकिस्तान के बीच एक और वार्ता को कवर करने के लिए पाकिस्तान में थी। लगातार दो दिनों की बातचीत के बाद,वार्ता सफल हुई और आखिरकार हमें भी खुद के लिए कुछ वक्त मिल गया। हम सभी भारतीय पत्रकारों ने इस वक्त का सदुपयोग 'प्राचीन भारत' यानी पाकिस्तान के शहर तक्षशिला को देखना तय किया। इस्लामाबाद से पश्चिम में करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर तक्षशिला है। दिलचस्प है कि स्थानीय लोग तक्षशिला को बड़े ही अज़ीब ढंग से उच्चारित करते हैं-टैक्सला। और,जब भी कोई टैक्सला कहता तो मैं अपनी दबी हुई हंसी छुपा नहीं पाती थी। हमें दोपहर में वहां जाना था,और तब तक मैंने होटल में ही रुकना तय किया था। मैं यह सोचकर ही बहुत रोमांचित थी कि थोड़ी देर में मुझे प्राचीन भारत के एक अहम शैक्षिक केंद्र पर जाना था। चाय के कई गर्म प्याले गटकते हुए मैंने उस सेंटर के बारे में तमाम कल्पनाएं कर डाली,जहां कभी चाणक्य जैसा टीचर हुआ करता था। विचारों की यह प्रक्रिया मुझे कल्पना में ही सैकडों साल पीछे ले गई,जब मौर्य वंश का राज हुआ करता था,और अशोक जैसा राजा राज करता था। उन्हीं के काल में तक्षशिला बौद्ध शिक्षा का अनूठा केंद्र बना था।


मेरी इस कल्पना यात्रा में दरवाजे पर बजी एक घंटी ने दखल दे डाला। ये हाउसकीपिंग वाले की घंटी थी। उसने मुझे कुछ दिखाने की इजाज़त मांगी,जो वो बड़ी बेताबी से शायद मुझे दिखाना चाहता था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वो अजनबी शख्स मुझे क्या दिखाने को बेकरार है। बहुत अनमने भाव से मैंने उससे कहा, ले आओ। वो कुछ देर में वापस आ गया। उसके हाथ में शानदार ढंग से पैक की गई तीन-साढ़े तीन इंच की कोई चीज थी। उसने मुझसे कहा कि इस कमरे में तीन साल पहले एक शख्स यह छोड़ गया था। और उसे कमरा साफ करते हुए ड्रॉवर में यह चीज मिली थी। मैंने उससे सीधा सवाल किया कि वो कैसे समझ रहा है कि मैं ही इस चीज़ को लेने के लिए ठीक हूं तो वो मुस्कुराया और चल दिया। सलीके से लिपटी इस चीज को हाथ में लेकर मैं घूरने लगी। काफी देर सोचने के बाद मैंने सोचा कि इसे अब खोल ही लिया जाए। और,जैसे ही कागज़ में लिपटी वो चीज़ बाहर आयी,मैं दंग रह गई। यह चिकनी मिट्टी के बने नन्हें बुद्धा की मूर्ति थी। मैं काफी वक्त तक असमंजस में थी कि क्या कहूं। लेकिन,दिन में हम तक्षशिला गए। विश्वविख्यात यूनिवर्सिटी का यह शहर अब बिलकुल बर्बाद हो चुका है। हालांकि, उस दौर की कई चीज़ें अभी भी म्यूजियम में सुरक्षित रखी गई हैं। यह हमारे लिए बेहद शानदार बौद्धिक और आध्यात्मिक अनुभव था। हम सभी ने इस अनुभव का भरपूर आनंद लिया और वापस अपने दौर में आ गए। और हां, चिकनी मिट्टी की इन बुद्धा ने मेरे साथ भारत तक यात्रा की।आज यह मेरे मंदिर में शान से विराजे हुए हैं।

6 comments:

अनुराग said...

होता है कई बार कुछ इत्तेफाक हमारी जिंदगी में तय होते है.....बुद्ध की मूर्ति को आपके पास आना था सो आ गयी .....बस पाकिस्तान में एक बात का दुःख है की भगत सिंह को जिस जेल में फांसी हुई थी उन्होंने उसे भी मिटा डाला ..कम से कम शहीदों का तो बँटवारा नही करते......

sidheshwer said...

आपके संस्मरण पढ़कर मुझे भीष्म साहनी के 'तमस' में वर्णित तक्षशिला उआ टेक्सिला वाले प्रसंग की याद आ गई. अच्छा लिखा है आप्ने!पाकिस्तान पर कुछ और लिखें, खासकर वहां के संगीत के मौजूदा दौर पर ..

pseudonymous me said...

lovely!! it has always been great reading your blog!!
keep up the good work ms.sheetal

स्वास्तिक माथुर said...

बहुत अच्छा लगा पढकर कि वहाँ म्यूजियम हैँ जो हमारे धरोहर को जीवित रखे हुये है

Rohit Tripathi said...

Shetal ji aaj pahli baar aana hua aapke blog pe... acha likha hai aapne.. likhte rahiye :-)

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I don’t want to love you… but I do....

Pagal Patrakar said...

Journalism today is not about breaking news,
It is about faking news now!
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